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हिमाचल में स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत

सन् 1845-46 के प्रथम अंग्रेज-सिक्ख युद्ध ने काँगड़ा तथा कुल्लू की पहाड़ी रियासतों को अंग्रेजों के चंगुल में धकेल दिया। 9 मार्च 1846 की सन्धि के अनुसार हिमाचल के अधिकांश हिस्से सिक्खों के छूटकर सीधे अंग्रेजी प्रशासन के अधीन आ गए, जिसके परिणामस्वरूप पहाड़ी रियासतों पर अंग्रेजों का एकाधिकार स्थापित हो गया। अंग्रेजों ने सिक्खों को 10 फरवरी 1846 सबराओं के युद्ध में हराया और लाहौर सन्धि की। लाहौर संधि से पहाड़ी राजाओं का अंग्रेजों से मोह भंग होने लगा क्योंकि अंग्रेजों ने उन्हें उनकी पुरानी जागीरें नहीं दीं। दूसरे ब्रिटिश-सिख युद्ध (1848 ई.) में काँगड़ा पहाड़ी की रियासतों ने सिखों का अंग्रेजों के विरुद्ध साथ दिया।
नुरपूर, काँगड़ा,जसवाँ और दतारपुर की पहाड़ी रियासतों ने अंग्रेजों के खिलाफ 1848 ई. में विद्रोह किया जिसे कमिश्नर लारेंस ने दबा दिया। सभी को गिरफ्तार कर अल्मोड़ा ले जाया गया जहाँ उनकी मृत्य हो गई। नूरपुर के वजीर राम सिंह पठानिया अंग्रेजों के लिए टेढ़ी खीर साबित हुए। उसने अंग्रेजों के विरुद्ध काँगड़ा क्षेत्र के अन्य राजाओं के साथ सन्धि करके एक सेना तैयार की। उन्हें शाहपुर के पास “डाले की धार” में अंग्रेजों ने हराया। उन्हें एक ब्राह्मण पहाड चंद ने धोखा दिया था। वजीर राम सिंह पठानिया को सिंगापुर भेज दिया गया जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।

1857 ई. की क्रांति-

1857 ई के स्वतंत्रता संग्राम की गूंज पहाड़ों में भी उठी। हिमाचल प्रदेश में कम्पनी सरकार के विरुद्ध विद्रोह की चिंगारी सर्वप्रथम कसौली सैनिक छावनी में भड़की। 20 अप्रैल 1857 ई को अम्बाला राइफल डिपो के छः सैनिकों ने कसौली में एक पुलिस चौकी में आग लगा दी।
   1857 ई के विद्रोह के समय शिमला हिल्स के कमाण्डर-इन-चीफ एसन और शिमला के डिप्टी कमिश्नर लाई विलियम हे थेशिमला के जतोग में स्थित नसीरी बटालियन (गोरखा रेजीमेण्ट) के सैनिकों ने 16 मई 1857 को विद्रोह कर दिया। कसौली में 80 सैनिकों (कसौली गार्ड के) ने विद्रोह कर सरकारी खजाने को लूटा। इन सैनिकों का नेतृत्व सूबेदार भीम सिंह कर रहे थे। कसौली की सैनिक टुकड़ी खजाने के साथ जतोग में नसारी बटालियन से आ मिली। शिमला में ये अफवाह फैल गई कि विद्रोही सैनिक शहर को लूटने आ रहे हैं।

कई पहाड़ी राज्यों ने अंग्रेजों की सहायता की। क्योंथल के राजा ने शिमला के महल और जुन्गा में अंग्रेजों को शरण दी। कोटी और बल्सन राज्यों ने भी अंग्रेजों की सहायता की। बिलासपुर राज्य के सैनिकों ने बालूगंज, सिरमौर राज्य के सैनिकों ने बड़ा बाजार में अंग्रेजों की सहायता कीभागल के मियां जय सिंह, धामी, भज्जी, कोटी और जुब्बल के राजाओं ने भी अंग्रेजों का साथ दिया। बिलासपुर के राजा हीरा सिंह ने भी अंग्रेजों की सहायता की। चम्बा के राजा श्री सिंह ने मियां अवतार सिंह के नेतृत्व में डलहौजी में अपनी सेना अंग्रेजों की सहायता के लिए भेजी।
1857 ई. के विद्रोह के समय सबाथू के ‘राम प्रसाद बैरागी‘ को गिरफ्तार कर अम्बाला भेज दिया गया जहाँ उन्हें मृत्युदण्ड दे दिया गया। काँगड़ा के पहाड़ी राज्यों में अंग्रेजी सरकार के लिए सहानुभूति थी।
जून 1857 ई. में कुल्लू में प्रताप सिंह के नेतृत्व में विद्रोह हुआ जिसमें सिराज क्षेत्र के नेगी ने सहायता की। प्रताप सिंह और उसके साथी वीर सिंह को गिरफ्तार कर धर्मशाला में 3 अगस्त, 1857 ई. को फाँसी दे दी गई। सिब्बा के राजा रामसिंह, नादौन के राजा जोधबीर चंद और मण्डी रियासत के वजीर घसौण ने अंग्रेजों की मदद की

बुशहर रियासत का रुख-
बुशहर रियासत हिमाचल प्रदेश की एकमात्र रियासत थी जिसने 1857 ई. की क्रांति में अंग्रेजों का साथ नहीं दिया और न ही किसी प्रकार की सहायता की। सुबेदार भीम सिंह ने कैद से भागकर बुशहर के राजा शमशेर सिंह के यहाँ शरण ली थी। शिमला के डिप्टी कमिश्नर विलियम हे बुशहर के राजा के खिलाफ कार्यवाही करना चाहते थे परन्तु हिन्दुस्तान-तिब्बत सड़क के निर्माण की वजह से और सैनिकों की कमी की वजह से राजा के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हो सकी। यहां तक कि विद्रोह के बाद भी उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की।

1857 ई. की क्रांति को अंग्रेजों ने पहाड़ी शासकों की सहायता से दबा दिया। इसमें विलियम हे ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजों ने गोरखों और राजपूत सैनिकों में फूट डलवाकर सभी सड़कों की नाकेबंदी कर दी। सूबेदार भीम सिंह सहित विद्रोही सैनिकों को कैद कर लिया गया। सूबेदार भीम सिंह भागकर रामपुर चला गया। परन्तु जब उसे विद्रोह की असफलता का पता चला तो उसने आत्महत्या कर ली।

1877 ई. में लार्ड लिटन के कार्यकाल में दिल्ली दरबार का आयोजन किया गयाइसमें चम्बा के राजा श्याम सिंह, मण्डी के राजा विजाई सेन और बिलासपुर के राजा हीराचंद ने भाग लिया1911 में दिल्ली को कलकत्ता के स्थान पर भारत की राजधानी बनाने की घोषणा की गई। इस अवसर पर दिल्ली में दरबार लगाया गया। इस दरबार में सिरमौर के राजा अमर प्रकाश, बिलासपुर के राजा अमर चंद, क्योंथल के राजा बिजाई सेन, सुकेत के राजा भीमसेन, चम्बा के राजा भूरी सिंह, भागल के राजा दीप सिंह और जुब्बल के राणा भगत चंद ने भाग लिया।

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